हरिद्वार 2 अप्रैल।
देवसंस्कृति विश्वविद्यालय के प्रतिकुलपति युवा आइकॉन डॉ चिन्मय पण्ड्या ने कहा कि सौभाग्यशाली लोग ही भगवान की योजना से जुड़कर उनके बताये कार्यों में संलग्न हो पाते हैं। जब गिद्ध, गिलहरी से लेकर हनुमान आदि का सौभाग्य जागा, तब वे मर्यादा पुरुषोत्तम प्रभु श्रीराम के कार्यों में जुट पाये। मनुष्य का सौभाग्य जब जागृत होता है, तब वह अपने भीतर की पुकार को सुन पाता है।
युवा आइकॉन डॉ चिन्मय पण्ड्या शांतिकुंज के मुख्य सभागार में आयोजित विशेष सभा को संबोधित कर रहे थे। उन्होंने कहा कि यह समय संक्रमण काल से गुजर रहा है। विभिन्न प्रकार की परिस्थितिजन्य स्थिति से लोग जूझ रहे हैं, लेकिन इस परिवर्तनशील दौर में ही हमें अपने सच्चे उद्देश्य और आध्यात्मिक मार्ग को पहचानने की आवश्यकता है। नवरात्रि साधना को युवा आइकॉन डॉ पंड्या जी ने नवयुग के निर्माण की पहली सीढ़ी बताया और कहा कि भगवान की योजना से जुड़कर ही व्यक्ति अपने जीवन के उद्देश्य को पूरी तरह से समझ पाता है और उससे संबंधित कार्यों में संलग्न हो पाता है। उन्होंने कहा कि गायत्री परिवार के जनक युगऋषि परम पूज्य गुरुदेव ने हम सभी को नवयुग के संविधान के रूप में १८ आदर्श सूत्र दिये हैं। स्वयं महाकाल स्वरूप परम पूज्य आचार्यश्री ने आवाहन किया है कि हम अपना जीवन मानवता के हित समर्पित करें और समझदारी, ईमानदारी, जिम्मेदारी और बहादुरी के साथ कार्य करें। प्रतिकुलपति ने कहा कि मात्र इच्छा करने से कोई कार्य पूरे नहीं होते, बल्कि इच्छा के साथ शक्ति को जोड़कर संकल्प के साथ कार्य करने पर वह पूरा होता है। जब हम मनोयोगपूर्वक सही दिशा में कदम बढ़ाते हैं, तो हम न केवल अपने जीवन को बल्कि समाज और राष्ट्र को भी सकारात्मक रूप से प्रभावित करते हैं।
इससे पूर्व शांतिकुंंज के भाइयों ने सुमधुर संगीत भजन प्रस्तुत किया। इस दौरान व्यवस्थापक श्री योगेन्द्र गिरि, पं. शिवप्रसाद मिश्र, डॉ ओपी शर्मा सहित शांतिकुंज कार्यकर्तागण एवं देश-विदेश से आये गायत्री साधक उपस्थित रहे।
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देवशक्तियों की उपस्थिति में गायत्री साधना होती हैं फलवती ः डॉ पण्ड्या
हरिद्वार 2 अप्रैल।
अखिल विश्व गायत्री परिवार प्रमुख श्रद्धेय डॉ प्रणव पण्ड्या ने कहा कि देवशक्तियों की उपस्थिति में गायत्री साधन अधिक फलदायी होती है। पवित्र और दिव्य ऊर्जा के वातावरण में जब हम गायत्री साधना करते हैं, तो हमारे मन और आत्मा पर गहरा सकारात्मक प्रभाव पड़ता है।
मानस मर्मज्ञ श्रद्धेय डॉ पण्ड्या नवरात्र साधना की व्याख्यानमाला के अंतर्गत देश-विदेश से आये साधकों को तीर्थ की महिमा विषय पर संबोधित कर रहे थे। उन्होंने कहा कि नैमिषारण्य श्रेष्ठ तीर्थों में से एक हैं, जहाँ अनेक ऋषियों ने साधना की और इच्छित फल प्राप्त किया।
इससे पूर्व संगीत के भाइयों ने ‘अपनी भक्ति का अमृत पिलो दो प्रभु’ भावगीत प्रस्तुत किया। जिससे साधकों ने मनोयोगपूर्वक साधना करने की ओर प्रेरित हुए। समापन से पूर्व देवसंस्कृति विश्वविद्यालय के विद्यार्थियों ने महाआरती की। इस अवसर पर देश विदेश से आये गायत्री साधक, देसंविवि-शांतिकुंज परिवार के अनेकानेक लोग उपस्थित रहे।